दशहरा, जिसे विजयादशमी भी कहा जाता है, भारत के सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। यह असत्य पर सत्य की जीत और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक है। इस दिन रावण के पुतले जलाए जाते हैं, दुर्गा पूजा का समापन होता है, और बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव मनाया जाता है।
लेकिन इन सभी भव्य आयोजनों के बीच, एक छोटी सी परंपरा हर साल निभाई जाती है—दशहरे के पत्ते का आदान-प्रदान। यह साधारण-सा दिखने वाला हरा पत्ता असल में सोने का प्रतीक, विजय का संदेश, और समृद्धि का आशीर्वाद होता है।
दशहरा पत्ता क्या है?
भारत के अलग-अलग हिस्सों में यह पत्ता अलग-अलग पेड़ों से लिया जाता है:
- आपटा का पेड़ (Bauhinia racemosa) – मुख्य रूप से महाराष्ट्र में उपयोग होता है।
- शमी का पेड़ (Prosopis cineraria) – उत्तर भारत, कर्नाटक और तमिलनाडु में पूजनीय है।
ये दोनों वृक्ष हिंदू धर्मग्रंथों और लोककथाओं में विशेष स्थान रखते हैं।
राजा रघु और ‘सोने के पत्तों’ की कथा (महाराष्ट्र)
महाराष्ट्र की एक प्रसिद्ध लोककथा के अनुसार, इक्ष्वाकु वंश के पराक्रमी राजा रघु, जिन्होंने भगवान राम को जन्म देने वाले वंश में जन्म लिया था, ने एक बार संपूर्ण दान कर दिया था।
जब एक गरीब ब्राह्मण बाद में आया और दान माँगा, तो राजा के पास कुछ नहीं बचा था। तब उन्होंने धन के देवता कुबेर पर आक्रमण कर उसके खजाने से सोना लाकर ब्राह्मण को दिया।
कुबेर उनकी दानशीलता से प्रसन्न होकर बोले कि अब से आपटा के पत्ते सोने के समान माने जाएंगे। तभी से दशहरे पर इन पत्तों को ‘सोना’ मानकर एक-दूसरे को दिए जाने की परंपरा है।
परंपरागत अभिवादन:
“सोना घ्या, सोना सारखा वागा”
(यह सोना लो, और जीवन में सोने की तरह चमको।)
महाभारत और शमी वृक्ष की कथा
महाभारत की एक कथा के अनुसार, पांडवों ने अपने अज्ञातवास के अंतिम वर्ष में अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्रों को एक शमी वृक्ष में छिपाया था, ताकि वे पकड़े न जाएँ।
विजयादशमी के दिन, उन्होंने अपने शस्त्रों को पुनः प्राप्त किया और धर्मयुद्ध की ओर प्रस्थान किया।
इसलिए दशहरे पर शमी वृक्ष की पूजा की जाती है, विशेष रूप से उन स्थानों पर जहाँ यह वृक्ष उपलब्ध है। यह शक्ति, विजय, और रक्षा का प्रतीक माना जाता है।
भारत के विभिन्न क्षेत्रों में परंपराएँ
क्षेत्र | उपयोग किया गया वृक्ष | परंपरा का नाम | महत्व |
---|---|---|---|
महाराष्ट्र | आपटा (Apta) | सोना आदान-प्रदान | समृद्धि, सौभाग्य का प्रतीक |
कर्नाटक/तमिलनाडु | शमी वृक्ष | आयुध पूजा | शस्त्रों और औजारों की पूजा |
राजस्थान | शमी वृक्ष | विजय पूजा | युद्ध पूर्व आशीर्वाद और विजय |
दशहरे के पत्ते का आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व
दशहरे का पत्ता केवल पेड़ की एक पत्ती नहीं है। यह:
- समृद्धि का प्रतीक है — जैसे राजा रघु की कथा में।
- शक्ति और विजय का प्रतीक है — जैसे पांडवों की कथा में।
- सामूहिक आशीर्वाद और सद्भावना का प्रतीक है — जब परिवारजन और मित्र इसे एक-दूसरे को भेंट करते हैं।
निष्कर्ष
जब हम दशहरे पर आपटा या शमी का पत्ता किसी को देते हैं, तो हम केवल एक पत्ता नहीं दे रहे होते—हम सोना, साहस, विजय, और शुभकामनाएँ दे रहे होते हैं।
यह परंपरा हमें याद दिलाती है कि त्योहार केवल उत्सव नहीं, बल्कि मूल्यों, संस्कृति और आपसी प्रेम का उत्सव हैं।
इस दशहरे पर, जब आप किसी को यह पत्ता दें, तो स्मरण रखें—आप एक पवित्र आशीर्वाद दे रहे हैं, जो जीवन को समृद्धि, शक्ति और शांति से भर देगा।